उच्च शिक्षा के विकास के लिए शिक्षण संस्थानों में अनुकूल आधारभूत संरचना जरूरीः राज्यपाल

Edited By Nitika, Updated: 19 Dec, 2021 11:26 AM

statement of governor

झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने उच्च शिक्षा के विकास के लिए शिक्षण संस्थानों में अनुकूल आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने की आवश्यकता पर बल दिया है।

रांचीः झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने उच्च शिक्षा के विकास के लिए शिक्षण संस्थानों में अनुकूल आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने की आवश्यकता पर बल दिया है।

बैस रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के जीर्णाद्वारित भवन के उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को गुणात्मक शिक्षा मिलें, उच्च शिक्षा सर्वसुलभ हो, जिससे राज्य के विद्यार्थी अपनी प्रतिभा से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झारखंड तथा देश का नाम रौशन करें। इसके लिए शिक्षकों को भी विशेष ध्यान देने की जरूरत तो है ही, उनकी जबावदेही भी आवश्यक है। राज्यपाल ने कहा कि रांची विश्वविद्यालय का यह दायित्व है कि वे विद्यार्थियों को निपुण एवं दक्ष बनाएं, उन्हें प्रोत्साहित करें कि वे जहाँ भी रहें अपने कार्य व आचरण से सबका नाम रौशन करें। उनकी एक देशभक्त एवं जिम्मेदार नागरिक के रूप में पहचान हो और उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना प्रबल हो।

राज्यपाल ने कहा कि प्राकृतिक एवं विभिन्न खनिज संपदा से परिपूर्ण इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के जनजाति प्राचीन काल से निवास करते आ रहे हैं। उनकी कला, संस्कृति, लोक- साहित्य, परम्परा एवं रीति-रिवाज अत्यन्त समृद्ध है और इसकी विश्व स्तर पर एक विशिष्ट पहचान है। उन्होंने कहा कि झारखंड के बुद्धिजीवी, शिक्षाविद्, भाषाविद्, संस्कृतिप्रेमी एवं कला के विद्वानों द्वारा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विकास एवं संवर्धन हेतु विश्वविद्यालय स्तर पर एक स्वतंत्र विभाग खोलने की इच्छाशक्ति ने इस विभाग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन महापुरुषों के सतत् प्रयास से स्नातकोत्तर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना सन् 1980 ई. में सम्भव हो सकी और 5 जनजातीय एवं चार क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई आरम्भ की गई।

बैस ने गर्व का विषय है कि हमारे विद्यार्थियों व शोधार्थियों ने भाषा, साहित्य, संस्कृति एवं कला के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करते हुए ऐसा वातावरण तैयार किया, जिससे विदेशों में भी इन भाषा, साहित्य, संस्कृति एवं कला को जानने-समझने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। कई विदेशी विद्वानों ने कुंड़ुख़, खोरठा, नागपुरी, कुरमाली, मुण्डारी, संताली जैसी 9 भाषाओं में शोध कार्य किया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन भाषाओं को स्थान और पहचान मिली। उन्होंने कहा कि सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका में संताली की पढ़ाई हो रही है। विनोद बिहारी महतो विश्वविद्यालय धनबाद में खोरठा, कुरमाली एवं संताली की छ:माही सर्टिफिकेट कोर्स की पढ़ाई हो रही है। उसी तरह विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग में छ: माह का सर्टिफिकेट कोर्स के साथ बीए स्तर तक खोरठा, कुंड़ुख़, कुरमाली, संताली आदि भाषाओं की पढ़ाई हो रही है। उन्होंने कहा कि रांची विश्वविद्यालय में सभी नौ भाषाओं की पढ़ाई स्नातकोत्तर स्तर तक हो रही है। कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा में भी स्नातकोत्तर स्तर तक हो, संताली, कुरमाली आदि की पढ़ाई हो रही है एवं नीलाम्बर पिताम्बर विश्वविद्यालय, मेदनीनगर में बीए स्तर तक कुंड़ुख़ भाषा में पढ़ाई हो रही है।

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