60 लाख खर्च कर पत्नी की स्मृति में बनवाया मंदिर, प्रेम की यह मिसाल दिल छू लेगी

Edited By Ramanjot, Updated: 01 Apr, 2025 07:27 AM

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प्रेम और समर्पण की मिसाल कायम करते हुए पूर्वी चंपारण के एक रिटायर्ड पंचायत सेवक ने अपनी पत्नी की याद में भव्य मंदिर का निर्माण कराया है। यह मंदिर न सिर्फ पति-पत्नी के अटूट प्रेम का प्रतीक बना, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणादायक बन गया है।

पूर्वी चंपारण: प्रेम और समर्पण की मिसाल कायम करते हुए पूर्वी चंपारण के एक रिटायर्ड पंचायत सेवक ने अपनी पत्नी की याद में भव्य मंदिर का निर्माण कराया है। यह मंदिर न सिर्फ पति-पत्नी के अटूट प्रेम का प्रतीक बना, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणादायक बन गया है। पत्नी के त्याग और समर्पण की वजह से पढ़ाई पूरी करने और फिर सरकारी नौकरी तक पहुंचने वाले इस बुजुर्ग ने अपने जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा को श्रद्धांजलि देने के लिए यह अनोखा कदम उठाया।

पत्नी की स्मृति में बनवाया मंदिर

पूर्वी चंपारण के कल्याणपुर प्रखंड में स्थित मधुचाई गांव के रहने वाले रिटायर्ड पंचायत सेवक बाल किशुन राम ने अपनी पत्नी शारदा देवी की याद में एक मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर में उन्होंने पत्नी की प्रतिमा स्थापित की और विधिवत पूजा-अर्चना शुरू की। सोमवार को बिहार सरकार के पर्यटन मंत्री राजू सिंह ने इस मंदिर का उद्घाटन किया।

60 लाख रुपये की लागत से बना भव्य मंदिर

बाल किशुन राम ने अपनी पत्नी की याद को चिरस्थायी बनाने के लिए करीब 60 लाख रुपये की लागत से यह मंदिर बनवाया। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी का निधन करीब छह वर्ष पहले हो गया था, जिसके बाद उन्होंने यह निर्णय लिया। मंदिर के निर्माण कार्य को पूरा होने में लगभग तीन वर्ष लगे। यह मंदिर प्रेम और समर्पण की अनूठी मिसाल बन गया है।

पति-पत्नी के प्रेम का प्रतीक बना यह मंदिर

पर्यटन मंत्री राजू सिंह ने इस अनोखे मंदिर के उद्घाटन अवसर पर कहा कि यह प्रेम और श्रद्धा का प्रतीक है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार इस मंदिर को और आगे बढ़ाने में पूरा सहयोग करेगी। यह स्थान अब लोगों को न सिर्फ भक्ति, बल्कि आपसी प्रेम और त्याग की भावना का भी संदेश देगा।

पत्नी के सहयोग से मिली शिक्षा और नौकरी

बाल किशुन राम बताते हैं कि गरीबी के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी। इसके बाद उन्होंने मजदूरी शुरू कर दी, लेकिन शादी के बाद उनकी पत्नी शारदा देवी ने उन्हें दोबारा पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया। पत्नी के सहयोग से उन्होंने शिक्षा पूरी की और फिर सरकारी नौकरी पाने में सफल रहे। पहले उन्हें ग्राम रक्षा दल में नौकरी मिली, जहां मात्र 30 रुपये वेतन मिलता था। बाद में 1987 में पंचायत सेवक के पद पर बहाल हो गए।

रिटायरमेंट के पैसे से कराया मंदिर का निर्माण

बाल किशुन राम का कहना है कि उनकी सफलता और आर्थिक समृद्धि पूरी तरह उनकी पत्नी के त्याग और प्रेरणा की देन थी। पत्नी के निधन के बाद उन्हें लगा कि उनके लिए कुछ करना चाहिए, इसलिए उन्होंने अपनी रिटायरमेंट की रकम से यह मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। आज यह मंदिर समाज में एक मिसाल बनकर खड़ा है।

मंदिर में सिर्फ पत्नी की प्रतिमा स्थापित

बाल किशुन राम ने बताया कि उन्होंने इस मंदिर में सिर्फ अपनी पत्नी की प्रतिमा स्थापित करवाई है। विधिवत पूजा-अर्चना के बाद मंदिर का उद्घाटन किया गया। यह मंदिर अब लोगों को न केवल भक्ति, बल्कि प्रेम, त्याग और प्रेरणा का संदेश भी देगा।

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