Edited By Diksha kanojia, Updated: 28 May, 2022 12:53 PM

मुंजनी ने कहा कि आदिवासियों की अगर इनको चिंता होती, तो महागठबंधन सरकार द्वारा 11 नवम्बर 2020 को विधानसभा से पारित कराकर केन्द्र सरकार को भेजे गये सरना कोड, जो झारखंड में जनजातीय समुदाय की वर्षों से लम्बित मांग रही है, को केन्द्र में बैठी भाजपा सरकार...
रांचीः झारखण्ड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रवक्ता सतीश पॉल मुंजनी ने भाजपा के 5 जून को आदिवासी महारैली मनाए जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि भाजपा को जनजातीय समुदाय की चिंता नहीं इनको सिर्फ राजनीति कर इनका लाभ उठाना है।
मुंजनी ने कहा कि आदिवासियों की अगर इनको चिंता होती, तो महागठबंधन सरकार द्वारा 11 नवम्बर 2020 को विधानसभा से पारित कराकर केन्द्र सरकार को भेजे गये सरना कोड, जो झारखंड में जनजातीय समुदाय की वर्षों से लम्बित मांग रही है, को केन्द्र में बैठी भाजपा सरकार जल्द से जल्द लागू करती। कहा कि भाजपा केवल दिखावा की राजनीति करती है। यदि भाजपा को आदिवासियों की चिंता होती तो भूमि अधिग्रहण कानून, एट्रोसिटी एक्ट, आरक्षण, छात्रवृति एवं वन अधिकार पट्टा में अपने शासनकाल के दौरान छेड़छाड़ नहीं करती। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि देश में एसटी और एससी समुदायों के खिलाफ अत्याचार का साल 2015 की तुलना में 2022 में लगभग 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो केन्द्र की मोदी सरकार की विफलता और आदिवासियों के प्रति हीन भावना को परिलक्षित करता है।
मुंजनी ने कहा कि आदिवासी और दलितों पर भाजपा शासित राज्यों में अत्याचार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। लाखों आदिवासी भूमिहीन हुए है। कांग्रेस पार्टी द्वारा यूपीए के शासन में सन् 2006 में वन अधिकार पट्टा कानून लाया गया था ताकि भूमि पर पीढि़यों से खेती और संरक्षण कर रहे आदिवासियों को उनका हक मिल सके और इनको स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो। लेकिन आज भाजपा की सरकार अतिक्रमण का आरोप लगाकर इनसे जमीन छीनकर परियोजनाओं, कृषि के निगमीकरण के समानांतर मोदी सरकार ने निजी निगमों के लिए खुले उत्खनन के लिए खोल दिया है, विशेष रूप से मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों के जंगलों में और मोदी जी दावा कर रहे हैं कि यह भारत को और अधिक आत्मनिर्भर बना देगा। मुंजनी ने कहा कि देश में सबसे अधिक आत्मनिर्भर जनजातीय समुदायों के पास खोने के लिए सबसे अधिक है। जंगलों की कटाई, भूमि के खनन और पानी को प्रदूषित किया जा रहा है और जो आदिवासी इसका विरोध करते हैं, उन्हें बार-बार झूठा माओवादी या नक्सली या देशद्रोही का आरोप झूठे केस में फंसाया जाता है।