Edited By Ramanjot, Updated: 20 Oct, 2026 03:58 PM

तीर्थ पुरोहित ने कहा कि भारतीय संस्कृति में कृतघ्नता को उचित नहीं माना गया है। यदि किसी शत्रु ने भी जाने-अनजाने कोई उपकार किया हो, तो उसके प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि रावण कैलाश से ज्योतिर्लिंग लेकर लंका जा रहा था।
रांची: झारखंड में विजयादशमी के अवसर पर जहां कई जगहों पर रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है, वहीं देवघर में रावण के पुतले नहीं जलाए जाते हैं। बाबा बैद्यनाथ धाम की नगरी देवघर में इस परंपरा के पीछे भगवान शिव के प्रति रावण की अटूट भक्ति और ज्योतिर्लिंग की स्थापना से जुड़ी धार्मिक मान्यता है। यहां रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि भगवान शिव के महान भक्त के रूप में भी याद किया जाता है।
मान्यता है कि रावण की वजह से ही बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना देवघर में हुई थी। देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था और कठोर तपस्या से उन्हें प्रसन्न कर ज्योतिर्लिंग लंका ले जाना चाहता था। हालांकि, दैवीय परिस्थितियों के कारण ज्योतिर्लिंग देवघर की धरती पर स्थापित हो गया। इसी वजह से बाबा बैद्यनाथ धाम को रावण की शिवभक्ति से जोड़कर देखा जाता है। बाबा बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहित प्रभाकर शांडिल्य बताते हैं कि देवघर में रावण को बुराई का प्रतीक नहीं मानने जैसी बात नहीं है, बल्कि यहां किसी के उपकार को नहीं भूलने की परंपरा है।
शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है देवघर
तीर्थ पुरोहित ने कहा कि भारतीय संस्कृति में कृतघ्नता को उचित नहीं माना गया है। यदि किसी शत्रु ने भी जाने-अनजाने कोई उपकार किया हो, तो उसके प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि रावण कैलाश से ज्योतिर्लिंग लेकर लंका जा रहा था। भगवान विष्णु की माया के कारण उसे ज्योतिर्लिंग देवघर की धरती पर रखना पड़ा और यहीं इसकी स्थापना हो गई। इस तरह रावण बाबा बैद्यनाथ धाम की स्थापना का निमित्त बना। इसी मान्यता के कारण देवघर में विजयादशमी पर रावण के पुतले जलाने की परंपरा नहीं है। देवघर ज्योतिर्लिंग के साथ शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है।
यहां गिरा था माता सती का हृदय
धार्मिक मान्यता है कि यहां माता सती का हृदय गिरा था। यही वजह है कि यहां भगवान शिव और माता शक्ति की पूजा विशेष आस्था के साथ होती है। प्रभाकर शांडिल्य के अनुसार, बाबा बैद्यनाथ को कामनालिंग के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव ध्यानमग्न रहते हैं, जबकि माता सती सदैव जागृत रहती हैं और भक्तों की मनोकामनाओं से उन्हें अवगत कराती हैं। बाबा को जलाभिषेक, जबकि माता को शृंगार और गठबंधन प्रिय है। इस तरह झारखंड के देवघर में रावण दहन नहीं करने की परंपरा धार्मिक आस्था, कृतज्ञता और रावण की शिवभक्ति के सम्मान का प्रतीक मानी जाती है।