बाबूलाल मरांडी ने पेसा नियमावली को लेकर हेमंत सरकार पर लगाया आरोप, कहा- आदिवासी समाज को अंधेरे में रखने की कोशिश जारी है

Edited By Khushi, Updated: 02 Jan, 2026 05:18 PM

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Ranchi News: झारखंड में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने पेसा नियमावली को लेकर कहा कि कोर्ट के दबाव में राज्य सरकार भले ही पेसा कानून लागू करने को मजबूर हुई हो, लेकिन आज भी उसे लेकर आदिवासी समाज को अंधेरे में रखने की कोशिश जारी...

Ranchi News: झारखंड में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने पेसा नियमावली को लेकर कहा कि कोर्ट के दबाव में राज्य सरकार भले ही पेसा कानून लागू करने को मजबूर हुई हो, लेकिन आज भी उसे लेकर आदिवासी समाज को अंधेरे में रखने की कोशिश जारी है।

मरांडी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा, आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और पहचान प्राचीन सनातन मूल्यों से गहराई से जुड़ी हुई है। यही परंपराएं आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना, स्वशासन और जीवन पद्धति की आधारशिला रही हैं। दुर्भाग्यवश, विदेशी धर्मों और वोटबैंक की राजनीति के प्रभाव में कुछ राजनीतिक दल आदिवासी समाज की इन्हीं जड़ों को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं। झारखंड में आदिवासी समाज को खंडित करने की सुनियोजित साजिश रची जा रही है, जहां धर्मांतरण, घुसपैठ और लोभ-लालच जैसे हथकंडों के माध्यम से चौतरफा हमला किया जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में राज्य सरकार की मशीनरी भी आदिवासी समाज को उनकी परंपरागत पहचान और मूल से दूर करने का प्रयास करती दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि कोर्ट के दबाव में राज्य सरकार भले ही पेसा कानून लागू करने को मजबूर हुई हो, लेकिन आज भी उसे लेकर आदिवासी समाज को अंधेरे में रखने की कोशिश जारी है।

मरांडी ने लिखा कि पेसा की मूल भावना आदिवासी स्वशासन पर सरकार की कोई स्पष्टता नहीं है। आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था सदियों से अस्तित्व में रही है, जिसमें मांझी-परगना, मुंडा-मानकी-दिउरी, ढोकलो-सोहोर, हातु मुंडा, पड़हा राजा, पाहन, सरदार, नापा और डाकुआ जैसे पदों को सामाजिक मान्यता प्राप्त रही है। पेसा तभी सार्थक होगा, जब इन पारंपरिक संस्थाओं और पदाधिकारियों को विधिवत मान्यता दी जाएगी। मरांडी ने कहा कि जब तक पेसा का वास्तविक अधिकार मूल आदिवासियों और उनकी पारंपरिक ग्राम सभाओं के हाथों में नहीं सौंपा जाता, तब तक पेसा कानून का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा। राज्य सरकार को पेसा की नियमावली सार्वजनिक कर ग्रामसभा के अधिकारों और रूढ़ीवादी स्वशासन पद्धति पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

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