झारखंड के इस जिले में लगता है 'भूत मेला', कई राज्यों से पहुंचते है हजारों लोग; पेड़ के आसपास का द्दश्य चौंका देने वाला

Edited By Khushi, Updated: 19 Mar, 2026 05:19 PM

a  ghost fair  is held in this district of jharkhand drawing thousands of visit

Jharkhand News: झारखंड की राजधानी रांची से करीब 230 किलोमीटर दूर पलामू जिले के हैदरनगर थाना क्षेत्र में स्थित हैदरनगर देवी धाम में हर साल ‘भूत मेला' लगता है। हैदरनगर देवी धाम में साल में दो बार, चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यह मेला लगता है।

Jharkhand News: झारखंड की राजधानी रांची से करीब 230 किलोमीटर दूर पलामू जिले के हैदरनगर थाना क्षेत्र में स्थित हैदरनगर देवी धाम में हर साल ‘भूत मेला' लगता है। हैदरनगर देवी धाम में साल में दो बार, चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यह मेला लगता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस मेले में हजारों की संख्या में लोग जुटते हैं, जिनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होते है जो खुद को भूत-प्रेत बाधा से पीड़ित मानते हैं।

झारखंड के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से भी लोग मेले में पहुंचते हैं। पलामू में लगने वाले इस मेले में आने वालों की मान्यता है कि हैदरनगर देवी धाम में उनकी ‘बाधा' दूर हो जाती है। मंदिर परिसर में झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र और तरह-तरह के अनुष्ठान किए जाते हैं। हालांकि, यह भी सच है कि यहां आने वाले सभी लोग अंधविश्वास में यकीन करने वाले नहीं होते। बड़ी संख्या में श्रद्धालु केवल मां भगवती की पूजा-अर्चना के लिए भी यहां पहुंचते हैं, लेकिन मेले का एक बड़ा हिस्सा ‘भूत-प्रेत उतारने' की प्रक्रिया को लेकर ही चर्चित है। मंदिर परिसर में एक प्राचीन पेड़ है, जो इस मेले का सबसे रहस्यमयी और भयावह प्रतीक माना जाता है। इस पेड़ में हजारों कीलें ठोंकी गई हैं। मान्यता है कि इन कीलों में भूत-प्रेत को कैद कर दिया जाता है।

पेड़ के आसपास का द्दश्य कई बार ऐसा होता है कि देखने वालों की रूह कांप जाए। लोग अपने परिजनों को पकड़कर लाते हैं, झाड़-फूंक कराते हैं, और ‘बाधा' दूर होने की उम्मीद में तरह-तरह के टोटके करते हैं। मेले के दौरान यहां तंबुओं और अस्थायी शिविरों की कतार लग जाती है। दूर-दूर से आए लोग यहीं ठहरते हैं। कुछ लोग दावा करते हैं कि उन्हें इस प्रक्रिया से राहत मिली है, जबकि कई मामलों में कोई वैज्ञानिक या चिकित्सीय प्रमाण सामने नहीं आता। वहीं इस मेले के दौरान प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराता है। मंदिर परिसर में आस्था का एक और रूप भी देखने को मिलता है। यहां ‘जिन्न बाबा' की मजार स्थित है, जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग पहुंचते हैं। लोग चादर चढ़ाते हैं, फातेहा पढ़ते हैं और मनोकामना पूरी होने की दुआ करते हैं। वर्षों से यहां काम कर रहे आशिक अली बताते हैं कि नवरात्र के दौरान प्रतिदिन सैकड़ों लोग मजार पर आते है।

1887 से चली आ रही परंपराइतिहास की बात करें तो इस मेले की शुरुआत करीब 1887 में हुई थी। एक स्थानीय ने बुजुर्ग बताते है कि औरंगाबाद के जम्होर से आए एक हलवाई परिवार ने यहां इस परंपरा की नींव रखी थी। पहले जम्होर में ऐसा मेला लगता था, जहां भूत-प्रेत उतारने का काम किया जाता था। बाद में वही परंपरा  हैदरनगर में शुरू हुई और आज भी जारी है। खास बात यह है कि आज भी उसी परिवार के लोग यहां प्रसाद के रूप में मिठाइयां तैयार करते हैं।

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