बिहार के गांवों के छिपे धार्मिक स्थल बन रहे आस्था के नए केंद्र, विकास को दे रही नई रफ्तार

Edited By Ramkesh, Updated: 26 Apr, 2026 01:02 PM

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बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित प्राचीन धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल अब तेजी से पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहे हैं। वर्षों तक अनदेखी रही कहानियां अब विकास की रफ्तार के साथ धीरे-धीरे पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करने लगी...

पटना: बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित प्राचीन धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल अब तेजी से पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहे हैं। वर्षों तक अनदेखी रही कहानियां अब विकास की रफ्तार के साथ धीरे-धीरे पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करने लगी हैं। गांवों का शांत वातावरण, मिलनसार लोग और रहस्यमयी जगहें किसी भी व्यक्ति में गहरा लगाव पैदा करती हैं।

राज्य एवं उसके बाहर के खोजी पर्यटकों व धार्मिक लोगों के लिए ये अनोखा अनुभव बनता जा रहा है।  इन स्थलों को पिछले कुछ वर्षों में विकसित किया गया है। इसके लिए शहरों से गांवों तक पक्की सड़क का निर्माण, बेहतर परिवहन सुविधा, बिजली, हाट-बाजारों का आधुनिकीकरण, पर्यटकों के लिए अन्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है। कैमूर जिला अपने पहाड़ों और नदियों के लिए पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है, लेकिन इसकी पौराणिक गाथाएं भी कम आकर्षक नहीं हैं।

रामगढ़ प्रखंड मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूर अकोढ़ी गांव स्थित है, जहां एक जागृत शक्तिपीठ और सिद्धपीठ है। कहते है कि वर्ष 1982-83 में यहां नौ दिवसीय विशाल यज्ञ का आयोजन हुआ था, जिसमें चारों पीठों के शंकराचार्य शामिल हुए थे। गांव में दुर्गावती नदी के तट पर स्थित प्राचीन देवी मंदिर श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच रहा है। नदी के पूर्वी छोर पर जौहरी मां का मंदिर और पश्चिमी छोर पर हनुमानगढ़ी मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण गाजीपुर के संत सत्यनारायणाचार्य जी महाराज ने करवाया था। यहां हर वर्ष हनुमान जयंती पर 21 विद्वान पंडित 108 बार सुंदरकांड का पाठ करते हैं। इस दिन गांव में आस्था का बड़ा संगम देखने को मिलता है। मकर संक्रांति के अवसर पर यहां खिचड़ी भोज का आयोजन होता है, जिसमें पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क ठहरने की व्यवस्था भी उपलब्ध है। 

बेहतर सड़क सुविधा से विकास की बयार यहा बह रही है। पर्यटकों की संख्या हर साल बढ़ रही है, जिससे गांव के लोगों को रोजगार मिला है। बेगूसराय जिले के वीरपुर पश्चिम पंचायत के वीरपुर टोला में पाल कालीन दुर्लभ मूर्तियां आज भी मौजूद हैं। इनमें सूर्य, बसहा और काली की प्राचीन मूर्तियां शामिल हैं। यह जगह जिला मुख्यालय से मात्र 13 किलोमीटर दूर है। स्थानीय लोग इन मूर्तियों की रोजाना पूजा करते हैं। वर्ष 2001-2003 के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और जीडी कॉलेज की टीम ने वीरपुर टीला का उत्खनन किया था, जिसमें ये ऐतिहासिक अवशेष मिले। धीरे-धीरे यह स्थल पर्यटकों के लिए भी विकसित हो रहा है।

 गया जिले के गुरुआ से करीब 20 किलोमीटर दूर नदौरा पंचायत में लगभग 300 वर्ष पुराना भगवान शिव का मंदिर है। यहां रोजाना औरंगाबाद जिले से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं। हर वर्ष महाशिवरात्रि और सावन पूर्णिमा पर यहां ऐतिहासिक मेला लगता है। इस मंदिर में घंटा बजाकर मन्नत मांगने की पुरानी परंपरा आज भी कायम है। 

नवादा जिले के नरहट प्रखंड की शेखपुरा पंचायत अपनी धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है। जिला मुख्यालय से 24 किलोमीटर और प्रखंड मुख्यालय से सिफर् तीन किलोमीटर दूर स्थित यह पंचायत कई रहस्यों को समेटे हुए है। यहां मां तारा देवी मंदिर अपनी अनोखी संरचना के लिए जाना जाता है। मंदिर परिसर में स्थित सात कोण वाला कुआं लोगों की जिज्ञासा का प्रमुख केंद्र है। स्थानीय मान्यता है कि इस कुएं से लगभग 500 मीटर लंबी गुफा जुड़ी हुई है, जिसका संबंध प्राचीन काल और राजा विराट की पुत्री से जोड़ा जाता है।

कुएं की पूजा के लिए भारी भीड़ जुटती है। पास ही झिकरूआ गांव में सूर्य मंदिर और विशाल तालाब है, जहां हर वर्ष छठ पूजा के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इसके अलावा ख्वाजा अब्दुल्ला चिश्ती की मजार भी यहां प्रमुख आस्था का केंद्र है। सैकड़ों वर्ष पुरानी इस मजार पर हर साल उर्स का आयोजन होता है, जिसमें बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह आयोजन धार्मिक सौहार्द का सुंदर उदाहरण है। यहां पहुंचने के लिए अच्छी सड़क सुविधा उपलब्ध है। 

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