Edited By Ramanjot, Updated: 19 Jan, 2026 06:32 PM

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के एक व्यक्ति के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि केवल घटना स्थल पर मौजूदगी और अस्पष्ट आरोप किसी को ट्रायल के लिए पर्याप्त नहीं हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि SC/ST एक्ट तभी लागू...
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी कथित अपराध स्थल पर केवल मौजूद होना, बिना किसी ठोस और विशिष्ट आरोप के, किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना कराने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी सिद्धांत को दोहराते हुए शीर्ष अदालत ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत बिहार के एक व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने पटना हाई कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें भागलपुर की एक ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित संज्ञान और समन आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया गया था।
क्या था मामला
यह मामला वर्ष 2019 में दर्ज एक FIR से जुड़ा है। शिकायतकर्ता, जो अनुसूचित जाति से संबंधित है, ने आरोप लगाया था कि एक आंगनवाड़ी केंद्र में उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट की गई तथा जाति से संबंधित अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया। इसके बाद 9 अक्टूबर 2020 को ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) के विभिन्न प्रावधानों और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) व 3(1)(s) के तहत अपराधों का संज्ञान लिया था।
हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
आरोपी केशव महतो ने SC/ST एक्ट की धारा 14A के तहत पटना हाई कोर्ट में संज्ञान और समन आदेश को चुनौती दी थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से दी गई इस दलील को रिकॉर्ड पर लिया कि अपीलकर्ता के खिलाफ कोई विशिष्ट या प्रत्यक्ष कृत्य का आरोप नहीं है और उसका नाम केवल इस आधार पर जोड़ा गया है कि वह कथित समय पर सह-आरोपियों के साथ मौजूद था। पीठ ने कहा कि ऐसे हालात में अपीलकर्ता को ट्रायल का सामना करने के लिए मजबूर करना “न्याय का मज़ाक” होगा।
SC/ST एक्ट की धाराओं की व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) अपने आप लागू नहीं हो जातीं, केवल इसलिए कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है।
अदालत ने कहा:
- केवल यह तथ्य पर्याप्त नहीं है कि शिकायतकर्ता SC/ST समुदाय से है।
- अपमान या धमकी उसके SC/ST समुदाय से होने के कारण दी जानी चाहिए।
- सिर्फ गाली देना या केवल जाति का नाम लेना, जब तक वह जानबूझकर अपमानित करने के इरादे से न हो, अपराध नहीं माना जाएगा।
FIR और चार्जशीट में कमी
FIR और चार्जशीट की जांच के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता के खिलाफ ऐसा कोई आरोप नहीं है जिससे यह साबित हो कि उसने जाति-आधारित शब्द कहे या शिकायतकर्ता को अपमानित करने के इरादे से कोई कार्य किया। अदालत ने यह भी कहा कि IPC के तहत लगाए गए आरोप भी सामान्य प्रकृति के हैं और उनमें आवश्यक कानूनी तत्वों का अभाव है।
अंतिम फैसला
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता के खिलाफ SC/ST एक्ट या IPC के तहत कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता। अदालत ने आदेश दिया, “हाई कोर्ट द्वारा पारित विवादित आदेश रद्द किया जाता है और अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक मुकदमा समाप्त किया जाता है।”