झारखंड के इस गांव में 200 साल से नहीं खेली गई होली, रंग छूने से भी डरते हैं लोग; वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

Edited By Khushi, Updated: 27 Feb, 2026 01:02 PM

holi hasn t been celebrated in this jharkhand village for 200 years and people

Jharkhand News: जहां एक ओर पूरे देश में होली का त्योहार रंग, गुलाल और खुशियों के साथ मनाया जाता है, वहीं झारखंड के बोकारो जिले का एक गांव ऐसा भी है, जहां पिछले करीब 200 सालों से होली नहीं मनाई जाती। इस गांव के लोग होली के दिन पूरी तरह सादगी और शांति...

Jharkhand News: जहां एक ओर पूरे देश में होली का त्योहार रंग, गुलाल और खुशियों के साथ मनाया जाता है, वहीं झारखंड के बोकारो जिले का एक गांव ऐसा भी है, जहां पिछले करीब 200 सालों से होली नहीं मनाई जाती। इस गांव के लोग होली के दिन पूरी तरह सादगी और शांति बनाए रखते हैं।

बोकारो के दुर्गापुर गांव की अनोखी परंपरा

झारखंड के बोकारो जिला के कसमार प्रखंड में स्थित दुर्गापुर गांव अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। दुर्गापुर पंचायत के 11 टोलों में करीब 1700 लोग रहते हैं। यहां होली के दिन न तो रंग खेला जाता है, न पिचकारी चलती है और न ही पकवान बनाए जाते हैं। पूरा गांव इस दिन शांत रहता है। ग्रामीणों का मानना है कि अगर उन्होंने होली मनाई तो गांव पर कोई बड़ी विपत्ति आ सकती है। इसलिए वर्षों से यहां होली का बहिष्कार किया जा रहा है।

राजाओं की रंजिश से जुड़ी है कहानी

गांव के पूर्व उपमुखिया भीम प्रसाद महतो के अनुसार, इस परंपरा के पीछे एक पुरानी और दुखद घटना जुड़ी है। बुजुर्गों की मानें तो करीब दो सदी पहले दुर्गापुर के राजा दुर्गा प्रसाद और रामगढ़ के राजा दलेल सिंह के बीच दुश्मनी हो गई थी। कहा जाता है कि रामगढ़ के राजा का सेनापति पश्चिम बंगाल से रानी के लिए साड़ी खरीदकर लौट रहा था। इसी दौरान दुर्गापुर के राजा ने शक के आधार पर उसे बंदी बना लिया। इतना ही नहीं, रानी के लिए लाई गई साड़ी एक नर्तकी को पहना दी गई। इस बात से नाराज होकर रामगढ़ के राजा ने दुर्गापुर के राजा दुर्गा प्रसाद देव की हत्या कर दी। इस संघर्ष में कई निर्दोष ग्रामीण और बच्चे भी मारे गए। इसी दुखद घटना के शोक में गांव ने होली मनाना बंद कर दिया, जो आज तक जारी है।

पहाड़ी बाबा को नहीं पसंद रंग

गांव की बुजुर्ग महिला बादली देवी बताती हैं कि गांव के देवता ‘बड़राव पहाड़ी बाबा’ को रंग, अबीर और धूल पसंद नहीं है। ग्रामीणों का विश्वास है कि अगर उनकी इच्छा के विरुद्ध होली मनाई गई तो अनहोनी हो सकती है। बादली देवी कहती हैं कि जब से वह इस गांव में बहू बनकर आई हैं, तब से उन्होंने कभी होली नहीं खेली। गांव में होली के दिन न कोई उत्साह होता है और न ही कोई विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। आज भी दुर्गापुर गांव में होली का दिन अन्य दिनों की तरह शांत और सामान्य तरीके से बिताया जाता है, जो इसे पूरे इलाके में अलग पहचान देता है।

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