Edited By Ramanjot, Updated: 18 Feb, 2026 11:04 PM

बिहार में लागू शराबबंदी कानून को लेकर अब सियासी तापमान बढ़ता जा रहा है। 2016 से प्रभावी इस नीति पर पहली बार सत्ता पक्ष के भीतर से ही सवाल खड़े होने लगे हैं।
पटना: बिहार में लागू शराबबंदी कानून को लेकर अब सियासी तापमान बढ़ता जा रहा है। 2016 से प्रभावी इस नीति पर पहली बार सत्ता पक्ष के भीतर से ही सवाल खड़े होने लगे हैं। एनडीए के सहयोगी दलों के नेताओं ने इसके क्रियान्वयन पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं, जिससे राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
जीतन राम मांझी का सीधा सवाल
केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख जीतन राम मांझी ने साफ कहा कि शराबबंदी का विचार गलत नहीं है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका पूरी तरह विफल साबित हो रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि छोटे स्तर पर शराब पीने वालों पर कार्रवाई हो रही है, जबकि बड़े तस्कर आसानी से बच निकलते हैं। मांझी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इस मुद्दे पर सख्ती और व्यापक समीक्षा की मांग की।
मांझी के अनुसार, शराबबंदी लागू होने से पहले राज्य को हर साल हजारों करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था, लेकिन अब अवैध तरीके से शराब की आपूर्ति हो रही है और सरकार को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।
विधानसभा में भी उठा मुद्दा
यह बहस तब और तेज हुई जब राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के विधायक माधव आनंद ने विधानसभा में शराबबंदी की समीक्षा की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि कानून लागू हुए लगभग दस साल हो चुके हैं, इसलिए अब इसके फायदे और नुकसान का मूल्यांकन होना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि शराब की अवैध आपूर्ति घर-घर तक पहुंच रही है और युवाओं में नशे की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
विपक्ष का समर्थन
विपक्षी दलों ने भी समीक्षा की मांग का समर्थन किया है। एआईएमआईएम के विधायक अख्तरुल ईमान ने कहा कि शराबबंदी का फायदा राज्य को नहीं बल्कि अवैध तंत्र को मिल रहा है। कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन ने तो इसे पूरी तरह असफल नीति करार दिया। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि अगर निष्पक्ष जांच हो जाए तो सच्चाई सामने आ जाएगी।
सरकार का रुख साफ
हालांकि सरकार की ओर से समीक्षा की मांग को खारिज कर दिया गया है। संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि शराबबंदी सभी दलों की सहमति से लागू की गई थी और इसे जारी रखा जाएगा।
लेकिन एनडीए के अंदर से उठ रही असहमति की आवाजें नीतीश सरकार के लिए नई चुनौती बनती दिख रही हैं, खासकर तब जब राज्य की वित्तीय स्थिति दबाव में है और राजस्व की कमी महसूस की जा रही है।