PM मोदी के खिलाफ कोर्ट जाने वाले RLJP महासचिव पार्टी से बर्खास्त, प्रदेश अध्यक्ष प्रिंस राज ने की कार्रवाई

Edited By Ramanjot, Updated: 01 Aug, 2022 12:22 PM

rljp general secretary sacked from party

हालांकि इस बयान में कुछ दिन पहले मुजफ्फरपुर में ओझा की ओर से दायर याचिका का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन पार्टी सूत्रों ने स्वीकार किया कि यह घटनाक्रम रालोजपा प्रमुख पशुपति कुमार पारस के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी के रूप में आया था, जो खुद केंद्रीय मंत्री...

पटनाः दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के रिश्तेदारों द्वारा गठित राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी ने रविवार को पार्टी के प्रदेश महासचिव सुधीर कुमार ओझा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण संगठन से बर्खास्त कर दिया। पार्टी के एक बयान के अनुसार प्रदेश अध्यक्ष और सांसद प्रिंस राज ने ओझा पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए निष्कासन का आदेश दिया।

हालांकि इस बयान में कुछ दिन पहले मुजफ्फरपुर में ओझा की ओर से दायर याचिका का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन पार्टी सूत्रों ने स्वीकार किया कि यह घटनाक्रम रालोजपा प्रमुख पशुपति कुमार पारस के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी के रूप में आया था, जो खुद केंद्रीय मंत्री हैं। राजनेताओं, फिल्मी सितारों और यहां तक कि विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के खिलाफ विभिन्न मुद्दों को लेकर याचिका दायर करने को लेकर चर्चा में रहने वाले पेशे से वकील ओझा ने मुजफ्फरपुर निवासी विनायक कुमार की ओर से शुक्रवार को विभिन्न क्षेत्रों में निजीकरण कर कथित तौर पर संविधान का उल्लंघन करने के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा गृह मंत्री अमित शाह, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत अन्य के खिलाफ एक याचिका दायर की थी।

ओझा की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि निजीकरण संविधान द्वारा गारंटीकृत समानता के अधिकार के खिलाफ है। इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख मुजफ्फरपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (पूर्वी) ने छह अगस्त को निर्धारित की है। दिवंगत पासवान के छोटे भाई पारस ने पिछले साल पासवान के बेटे और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी चिराग को छोड़कर अन्य सभी सांसदों के साथ मिलकर लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को तोड़कर एक अलग गुट बना लिया था। पारस ने अपने और दिवंगत पासवान के भतीजे प्रिंस राज को अपने गुट का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था, जिसके बाद चुनाव आयोग द्वारा पारस और चिराग के नेतृत्व वाले गुटों को अलग-अलग दलों के रूप में मान्यता दी गयी और जिसके बाद चिराग के गुट को लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के रूप में जाना जाता है।

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